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गया श्राद्ध विचार

 जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिणावा जायते 

 ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः इति श्रुतिः । । बौधा०धर्मसूत्र ।। २७५




 मानव मात्र के जन्म लेते ही देवऋण पितृऋण और ऋषिऋण से युक्त हो जाता है। इसऋण की मुक्ति के लिये भी शास्त्र ने उपाय बतलायें है यथा - 

 ऋणदेवस्य यागेन ऋषीणां दानकर्मणा। 

 सन्तत्या पितृलोकानां शोधयित्वा परिव्रजेत् ।। 

रघुवंश महाकाव्य प्रथमसर्ग की श्लोक सं०७१ की टीका 


देवऋण से मुक्त होने के लिये देवयजन, अध्ययननादि कर्मसे ऋषियों का ऋण और संन्तानोत्पत्ति पितृऋण का निराकरण होता है । सन्तान होने का तात्पर्य जो सुख दे। धर्मसूत्र कहतें है कि - 

 सत्पुत्रमुत्पाद्यत्मानं तारयति।। 

 सत्पुत्र साधुपुत्र अध्ययनविज्ञानानुष्ठानसम्पन्नो । 


सत्पुत्र अच्छे आचरण वाला जो अध्ययन, क्रियावान व विज्ञान से युक्त हो ।।


देवी भागवत षष्ठ स्कन्द ४ सर्ग श्लोक १५-

 जीवतो वाक्य करणात् क्षयाहे भूरि भोजनात्। 

 गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता ।। 


जीवित रहने पर आज्ञा मानना, मरने के पश्चात् ब्राह्मण भोजन से व गया में पिण्डदान करने से ही पुत्र की पुत्रता सिद्ध होती है


शास्त्रानुसार -


 एष्टव्या बहवः पुत्राः यद्येकोपि गयां व्रजेत् । 

 एष्टव्या बहवः पुत्राः नीलं वा वृषमुम्सृजेत्।। 

बो०ध० सूत्र पृ-२७५ 

बहुत से पुत्रों की कामना करनी चाहिए कि उसमे से यदि एक भी गया जाकर पिण्डदान अथवा नीलवृष का उत्सर्जन कर देगा तो हमारी मुक्ति हो जायेगी। इन प्रमाणों को आधार मानकर यावज्जीवन अपने मातापिता का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।


यह तिथि पर एकोदिए श्राद्ध तथा पर्व पर पार्वणश्राद्ध, आश्विनकृष्ण पक्ष मे महालयश्राद्ध, तीर्थों में तीर्थ श्राद्ध एवं गयाजी में गया श्राद्ध, विवाह, मुण्डन, उपनयन, यज्ञादि कर्मों में वृद्धि श्राद्ध( नान्दी श्राद्ध करना चाहिए।


मानवमात्र को पूरे साल ९६ श्राद्ध करने का विधान धर्मसिन्धुकार ने कहा है। यदि सम्भव हो सब करे अन्यथा आश्विन कृष्ण पक्ष मे महालय श्राद्ध, घर मे किसी के मरने पर तिथि मे एकोद्दिष्ट श्राद्ध या गया श्राद्ध अवश्य ही करें।


 आजकल सनातन धर्मावलम्बि जनों के मानसपटल पर यह धारणा हो गयी है कि गया श्राद्ध करने के बाद श्राद्ध आदि नहीं करना चाहिए। यह विचार निराधार एवं निर्मूल है। जबतक मनुष्य जीवित रहे अपने पितृगणों के निमित्त श्राद्ध अवश्य करे। 


 गया श्राद्ध नित्य है इसे बार बार करना चाहिए। 


कब करें गया श्राद्ध पिंडदान ।


श्राद्धरम्भे गयायं ध्यात्वा ध्यात्वा देव गदाधर। स्व् पितृ मनसा ध्यात्वा ततः श्राद्ध समाचरेत्।।

।। गया श्राद्ध का उपयुक्त समय ।।

गयायाम् सर्वकालेषु पिंडम दधात् विचक्षणः।

अधिमासे जन्मदिनेअस्ते च गुरु - शुक्रयोः।

न त्यक्रवयं गया श्राद्ध सिंहस्थे च वृहस्पतौ । ।

गयश्राद्ध प्रकूप्रीत संडक्रान्तयादौ विशेषतः।

मीनेमेषे स्थिते सूर्ये कन्यायां कार्मुके घटे।

दुर्लभं त्रिषु लोकेषु गयायाम् पिण्डपातनं (वायु पुराण) ।।

शास्त्रों के वचनानुसार गयश्राद्ध सभी समय कर सकते है यह स्पष्ठ निर्देश है व विशेषतः अधिमास ,जन्मदिन ,गुरुशुक्र के अस्त में सिंह राशि में , वृहस्पति होने पर गया तीर्थ में पिण्डदान का त्याग न करे । मीन(चैत्र माह ) ,मेष(वैशाख माह ),कन्या (आश्विन माह),धनु (पौष माह) , कुंभ(फाल्गुन माह),मकर (माघ माह), राशि में सूर्य स्थित होने पर गया श्राद्ध(पिंडदान )करे ।। ॐ नमो नारायण । गया श्राद्ध का शास्त्रों द्वारा वर्णित समय के सम्बन्ध में वायु पुराण व अन्य पुराणों में कहा गया ।.


मनुस्मृति ३/२६९, मार्कण्डेय स्मृति पृ १५९, वायुपुराण पृ ४१२ 

 प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा । 

 पित्र्यमानिधनात्कार्यं विधिवद्दर्भ पाणिना ।। 

 मृताहं समतिक्रम्य चाण्डालः कोटि जन्मसु। 

 पितामहस्य यच्छ्राद्धं साङ्गोपाङ्गैकसंयुतम् ।। 

 यावज्जीवं तथा कुर्यात् न त्यजेद्यदि तत्त्यजेत्।। 

 अधिकं प्रत्यवायी स्यात् तेन स्वकृत पुण्यतः ।। 

 च्युतो भवति तस्मात्तु तद् यथोक्तं समाचरेत्। 

 अपसव्ये कृते येन विधिवद्दर्भ पाणिना ।। 

 पित्र्यम् अनिधनात् कार्यमेवं प्रीणाति वै पितॄन् । 


 इयमेव व्यवस्था वार्षिक महालय श्राद्धादिष्ववगन्तव्या । 


उत प्रमाणों के आधार पर यावत् जीवन श्राद्ध करने का विधान कहा गया है। इसे नहीं करने से मनुष्य प्रायश्चिति होता है तथा चाण्डाल योनि को प्राप्त करता है। साथ ही पूर्वकृत पुण्य भी नष्ट हो जाता